वाराणसी में मुठभेड़ में मारे गए 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू के मोबाइल से ATS को प्रतिबंधित ‘जंगी एप’ मिला है। जांच एजेंसी के मुताबिक, इस एप का इस्तेमाल नक्सली, उग्रवादी, ड्रग पेडलर और शातिर अपराधी आपसी बातचीत और नेटवर्क संचालन के लिए करते हैं। एप में टेक्स्ट, फोटो, वीडियो, वॉयस और वीडियो कॉल एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन से सुरक्षित रहते हैं। साथ ही चैट और अन्य डेटा सर्वर पर सेव होने के बजाय यूजर के मोबाइल में ही स्टोर होता है। ATS को आशंका है कि बृजेश इसी एप के जरिए अपने नक्सली नेटवर्क का संचालन कर रहा था। मोबाइल से मिले संदिग्ध नंबरों की भी जांच की जा रही है।
साइबर एक्सपर्ट मृत्युंजय सिंह के अनुसार, जंगी एप के इस्तेमाल के लिए मोबाइल नंबर या सिम कार्ड की जरूरत नहीं होती। एप यूजर को एक यूनिक नंबर देता है, जो उसकी पहचान के तौर पर इस्तेमाल होता है। कम नेटवर्क में भी यह एप काम कर सकता है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में ड्रग तस्करों समेत अन्य अपराधियों द्वारा इस तरह के एप के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है। बृजेश के मोबाइल में यह एप मिलना जांच के लिहाज से अहम इनपुट माना जा रहा है। फिलहाल ATS ने मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया है, जहां से बृजेश के नेटवर्क और संपर्कों से जुड़ी और जानकारी मिलने की उम्मीद है।
वहीं, नक्सली कमांडर बृजेश गंझू का पोस्टमार्टम देर रात शिवपुर स्थित पोस्टमार्टम हाउस में वीडियोग्राफी के साथ कराया गया। पोस्टमार्टम उसके भाई राकेश की मौजूदगी में किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बृजेश के सीने में दो गोलियां लगी थीं। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। अब ATS और अन्य जांच एजेंसियां उसके मोबाइल में मिले संदिग्ध नंबरों, जंगी एप और अन्य डिजिटल जानकारी के आधार पर उसके नक्सली नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।


