वार्षिक ‘लंका की नक्कटैया लीला’ मेला अपने पारंपरिक जुलूस के साथ शुरू हुआ। यह मेला 18वीं शताब्दी में बाबा फतेह राम द्वारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने और सामाजिक जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।जुलूस में रामायण की शूर्पणखा की नाक काटने की घटना का दृश्य प्रदर्शित किया गया, साथ ही लाग-विमानों के माध्यम से ब्रिटिश अत्याचारों का चित्रण किया गया। ऐतिहासिक रूप से, इस मेले को क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भी अपने गुप्त सम्मेलनों के लिए इस्तेमाल करते थे।ये जुलूस वाराणसी के सबसे बड़े और पारंपरिक मेलों में से एक है।
प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्थाओं के साथ मेले का आयोजन किया। समकालीन मुद्दों पर आधारित लाग-विमानों ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा।मेला और जुलूस का उद्घाटन वाराणसी के पुलिस कमिश्नर और जिलाधिकारी द्वारा रात 12 बजे किया गया।
