महाशिवरात्रि के बाद काशी में शिव-विवाह परंपराओं का अगला अध्याय आरंभ होने जा रहा है। रंगभरी (अमला) एकादशी से पूर्व माता गौरा के गौने की रस्में 24 फरवरी से प्रारंभ होंगी। टेढ़ीनीम स्थित गौरा-सदनिका में आयोजित पत्रकार वार्ता में महंत पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी की शताब्दियों पुरानी परंपरा के अनुरूप इस वर्ष भी नौ गौरी–नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित पावन हल्दी माता गौरा को अर्पित की जाएगी।24 फरवरी को महंत आवास में माता गौरा की तेल-हल्दी की रस्म संपन्न होगी। इससे पूर्व दुर्गा मंदिर वाराणसी में विशेष अनुष्ठान कर हल्दी को वैदिक मंत्रों से पूजित किया जाएगा। 11 वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार और मंगलगीतों के बीच गौरा की चल प्रतिमा को हल्दी चढ़ाई जाएगी। 25 फरवरी को बाबा की पारंपरिक पालकी का पूजन होगा तथा माता गौरा का षोडशी श्रृंगार किया जाएगा।
26 फरवरी को सायं 6:30 बजे बाबा का प्रतीकात्मक रूप से गौना लेने गौरा-सदनिका में आगमन होगा। बाबा को राजसी परिधान और विशेष देव किरीट से सजाया जाएगा।27 फरवरी शुक्रवार को रंगभरी एकादशी के अवसर पर सायं 5 बजे काशी विश्वनाथ मंदिर से बाबा की ऐतिहासिक पालकी यात्रा निकलेगी। पालकी टेढ़ीनीम महंत आवास से नवग्रह मंदिर, विश्वनाथ गली, साक्षी विनायक, ढुंढिराज गणेश और अन्नपूर्णा मंदिर होते हुए विश्वनाथ मंदिर पहुंचेगी। मार्ग में श्रद्धालु अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से स्वागत करेंगे।इसी क्रम में तैयारियों का जायजा लेने डीआईजी शिव हरी मीणा महंत आवास पहुंचे। उन्होंने सुरक्षा एवं व्यवस्थाओं की समीक्षा करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए, ताकि रंगभरी एकादशी और गौना महोत्सव शांतिपूर्ण व सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सके।महंत पं. वाचस्पति तिवारी ने कहा कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है, जो हर वर्ष पूरे नगर को भक्ति और उल्लास के रंग में रंग देता है।

