स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ इन दिनों अनसर काल में हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार महाअभिषेक के उपरांत भगवान को ज्वर हो जाता है, इसलिए उन्हें लगभग 15 दिनों तक विश्राम दिया जाता है। इस दौरान सार्वजनिक दर्शन बंद रहते हैं और भगवान की सेवा एक रोगी की तरह की जाती है।मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की विशेष सेवा की जा रही है। प्रभु के स्वास्थ्य लाभ के लिए औषधीय जड़ी-बूटियों का लेप लगाया जा रहा है, औषधीय काढ़ा अर्पित किया जा रहा है तथा प्रतीकात्मक रूप से थर्मामीटर से उनका ज्वर भी मापा जा रहा है।
मंदिर के सचिव शैलेश त्रिपाठी ने बताया कि स्नान पूर्णिमा पर भगवान का 108 पवित्र तीर्थों के जल और विभिन्न औषधीय द्रव्यों से महाअभिषेक किया जाता है। परंपरा के अनुसार इसके बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और अनसर काल में उन्हें विश्राम दिया जाता है। इस दौरान राजभोग, भव्य शृंगार और भारी वस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। भगवान को खिचड़ी, हल्का सात्विक भोजन तथा तुलसी, सोंठ, अदरक, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी और शहद से तैयार विशेष औषधीय काढ़ा अर्पित किया जाता है।
![]() |
| Advertisement |
पुजारी राधा जीवनदास ने बताया कि अनसर काल में भगवान को रेशमी वस्त्रों के स्थान पर हल्के सूती वस्त्र धारण कराए जाते हैं, ताकि विश्राम और स्वास्थ्य लाभ की परंपरा का पालन किया जा सके। वहीं गिरधर गोपाल दास ने बताया कि दर्शन बंद होने के बावजूद श्रद्धालु मंदिर परिसर के बाहर से ही भगवान को प्रणाम कर उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना कर रहे हैं।
![]() |
| Advertisement |
मंदिर में चल रही यह सेवा श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का अनूठा उदाहरण है। श्रद्धालुओं को अब 19 जुलाई को निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का इंतजार है। मान्यता है कि अनसर काल की समाप्ति के बाद भगवान नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे।
![]() |
| Advertisement |



