सावन की फुहारों और गंगा की लहरों के बीच काशी में इन दिनों कजरी की मधुर स्वर लहरियां गूंज रही हैं। पद्मश्री लोकगायिका मालिनी अवस्थी गंगा के बीच क्रूज (बजरा) पर देश-विदेश से आए 56 विद्यार्थियों को कजरी गायन का प्रशिक्षण दे रही हैं। पांच दिवसीय यह कार्यशाला केवल संगीत प्रशिक्षण तक सीमित नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, प्रकृति और गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ने का अनूठा अवसर भी है।
मालिनी अवस्थी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ की कृपा से पिछले छह वर्षों से आषाढ़ और सावन में कजरी कार्यशाला आयोजित की जा रही है। शुरुआती कार्यशालाएं मिर्जापुर में हुईं, इसके बाद चुनार, चंदौली और राजदरी में भी आयोजन किया गया। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर काशी को कार्यशाला के लिए चुना गया है।
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कार्यशाला में भारत के विभिन्न शहरों के साथ सिंगापुर से भी प्रतिभागी पहुंचे हैं। 18 वर्ष की छात्रा से लेकर 70 वर्ष से अधिक उम्र के लोग कजरी सीख रहे हैं। मालिनी अवस्थी ने कहा कि कजरी केवल सुरों का संगीत नहीं, बल्कि प्रकृति की अनुभूति है। बारिश की बूंदों, बादलों की गर्जना और प्रकृति की ध्वनियों को महसूस करके ही इसके भावों को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है।
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कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों को गायन के साथ योग, ध्यान और एकाग्रता का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इसका समापन गुरु पूर्णिमा पर होगा, जब विद्यार्थी मंच पर अपनी सीखी हुई कजरियों की प्रस्तुति देंगे।
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मालिनी अवस्थी ने कहा कि काशी, मिर्जापुर, चुनार और चंदौली की धरती पर कजरी की समृद्ध परंपरा आज भी जीवंत है। गंगा की गोद में आयोजित यह कार्यशाला लोकसंगीत की इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की अनूठी पहल है।



